रंगमंच

मंच पर सब पात्र हैं

सब रंग हैं

सब साथ हैं

थामे हैं हाथ कोई किसी का

कोई यूँही अकेले खड़ा है कहीं

दिल की बात कह रहा कोई

कोई दिल बहलाने को बतला रहा

कुछ सुन रहे

कुछ समझ रहे

कुछ और भी हैं

महसूस करने वाले

सारा प्रपंच है

और सबकी अपनी कहानी

कहने सुनने के इस सिलसिले में

रिश्ते गढ़ते जाते हैं

साथ बिताए समय को

यादों में संजों के रखते हैं

अंधेरी रातों में ये

तारों की तरह चमकते हैं

पात्र कुछ जाते हैं

नये किरदार आ जाते हैं

रंगमच का खेल

निरंर चलता रहता है

मंच पर सब पात्र हैं

सब रंग हैं।

सब साथ हैं।।

शब्द के आडम्बरों में अर्थ मेरा खो न जाये. Engineer,Ex-Fellow-Teach for India,Quizzing enthusiast, Runner, Like to write poems...and proud Indian.